
आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में जन्मी ज्योति याराजी ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह 100 मीटर बाधा दौड़ में भारत का नाम दुनिया भर में रोशन करेंगी। साधारण परिवार, सीमित साधन और अनेकों चुनौतियों के बीच पली-बढ़ी ज्योति ने अपनी मेहनत से असाधारण मुकाम हासिल किया।
एक साधारण परिवार से ऊंची उड़ान
28 अगस्त 1999 को जन्मी ज्योति के पिता एक सुरक्षा गार्ड थे और उनकी मां घरों में काम करती थीं। परिवार की आर्थिक हालत बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन सपनों की उड़ान ऊंची थी। स्कूल के दिनों में ही ज्योति की फुर्ती और तेज़ रफ्तार ने कोचों का ध्यान खींचा।
यहीं से शुरू हुआ एक लंबा और कठिन सफर — सुबह-सुबह अभ्यास, थकान, चोटें और कई बार निराशा। लेकिन ज्योति हर बार उठीं, और पहले से ज़्यादा मजबूत होकर लौटीं।
jyothi yarraji 100m hurdles : ट्रैक पर लिखा गया इतिहास
ज्योति याराजी ने 100 मीटर बाधा दौड़ में वो कर दिखाया, जो पहले किसी भारतीय महिला ने नहीं किया था। उन्होंने 13 सेकंड से कम समय में यह रेस पूरी कर इतिहास रच दिया और 12.78 सेकंड के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम किया, ये भारत के लिए अत्यंत भावुक पल था।
उनकी मेहनत का फल तब और चमका जब उन्होंने
- एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2023 और 2025 में स्वर्ण पदक जीता
- एशियन गेम्स 2022 में रजत पदक हासिल किया
- पेरिस ओलंपिक 2024 में 100 मीटर बाधा दौड़ में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला बनीं
- 2025 की एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने सिर्फ़ गोल्ड नहीं जीता, बल्कि एक नया चैंपियनशिप रिकॉर्ड भी बनाया।
ज्योति का करियर उतार-चढ़ाव से भरा रहा। चोटों ने कई बार उनका रास्ता रोका, लेकिन उन्होंने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। हर चोट के बाद वापसी, हर हार के बाद नई शुरुआत — यही ज्योति की असली ताकत रही।
आज जब वह ट्रैक पर दौड़ती हैं, तो सिर्फ़ रेस नहीं जीततीं, बल्कि उन लाखों लड़कियों को उम्मीद देती हैं, जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकलती हैं।
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