हर साल बजट आता है, सुर्खियां बनती हैं, टैक्स बढ़ता-घटता है, योजनाओं की बारिश होती है। लेकिन जब भी भारत के आर्थिक इतिहास की बात होती है, एक ही बजट सबसे ऊपर रखा जाता है — 1991 का बजट।

सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या था उस बजट में, जो बाकी बजटों में नहीं था?
जब देश के पास विदेशी पैसे ही नहीं बचे थे
1991 का भारत आज वाला भारत नहीं था।
उस वक्त हालात ये थे कि देश के पास इतना भी विदेशी मुद्रा भंडार नहीं था कि दो-तीन हफ्ते का पेट्रोल, दवाइयां और जरूरी सामान आयात कर सके।
सरकार को मजबूरी में सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा।
महंगाई आसमान छू रही थी।
फैक्ट्रियां बंद हो रही थीं।
नौकरियां खत्म हो रही थीं।
और दुनिया में भारत की साख लगातार गिरती जा रही थी।
यानी हालत ऐसी थी कि अगर कुछ बड़ा नहीं किया जाता, तो देश आर्थिक दिवालिया घोषित हो सकता था।
आसान रास्ता छोड़कर मुश्किल रास्ता चुना गया
उस वक्त प्रधानमंत्री थे पीवी नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री बने डॉ. मनमोहन सिंह।
उनके पास दो रास्ते थे —
पहला, पुराने ढर्रे पर चलते रहो।
दूसरा, पूरी व्यवस्था बदल दो।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
और यहीं से आया 1991 का ऐतिहासिक बजट।
ये बजट सिर्फ पैसे का हिसाब-किताब नहीं था, ये भारत की सोच बदलने वाला दस्तावेज था।

लाइसेंस राज की विदाई – सिस्टम की सबसे बड़ी सफाई
आज आप दुकान खोल सकते हैं, स्टार्टअप शुरू कर सकते हैं, कंपनी बना सकते हैं।
लेकिन 1991 से पहले ऐसा नहीं था।
तब हर फैक्ट्री, हर उद्योग के लिए सरकारी लाइसेंस चाहिए होता था,
फाइलें घूमती थीं,
घूस चलती थी,
काम सालों अटकता था।
1991 के बजट में पहली बार कहा गया —
अब उद्योगों को आज़ादी मिलेगी।
सरकार हर बात में दखल नहीं देगी।
इसी को कहा गया लाइसेंस राज का अंत।
यहीं से भारत में निजी कंपनियों को असली ताकत मिली।
दुनिया के लिए खुले भारत के दरवाजे
1991 से पहले विदेशी कंपनियों के लिए भारत लगभग बंद था।
लेकिन इस बजट में पहली बार विदेशी निवेश को खुली छूट दी गई,
सीमा शुल्क जो 220 प्रतिशत तक था, उसे घटाया गया।
आयात-निर्यात आसान हुआ
विदेशी कंपनियों को भरोसा हुआ कि भारत अब व्यापार के लिए तैयार है।
यही वो दौर था जब भारत ने ग्लोबल इकॉनमी से हाथ मिलाया।

निर्यात बढ़ा, नौकरियां बनीं, अर्थव्यवस्था सांस लेने लगी
सरकार ने व्यापार को सरल बनाया,
टैक्स सिस्टम बदला,
उद्योगों पर से बेवजह की रोक हटाई गई।
धीरे-धीरे असर दिखने लगा।
निर्यात बढ़ा,
नई फैक्ट्रियां खुलीं,
लोगों को काम मिलने लगा,
सरकारी खजाना भरने लगा।
देश जो डूबने की कगार पर था, उसने दोबारा चलना शुरू कर दिया।
फिर सवाल आता है – बाकी बजट टर्निंग पॉइंट क्यों नहीं बने?
इसके बाद भी कई अच्छे बजट आए।
कई सुधार हुए।
लेकिन 1991 जैसा कोई बजट नहीं बन पाया।
क्यों?
क्योंकि बाकी बजट सुधार थे,
लेकिन 1991 का बजट क्रांति था।
बाकी बजट टैक्स बदलते हैं, योजनाएं जोड़ते हैं।
1991 के बजट ने पूरी आर्थिक सोच बदल दी।
ये मजबूरी में लिया गया फैसला था, जिसने देश की किस्मत बदल दी।
आज का भारत उसी फैसले की देन है
आज भारत के पास दुनिया का चौथा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है,
स्टार्टअप हैं,
आईटी कंपनियां हैं,
मल्टीनेशनल कंपनियां हैं,
और भारत को उभरती वैश्विक ताकत कहा जाता है।
अगर 1991 में वो कदम न उठाया गया होता, तो शायद भारत आज भी संकट में जूझ रहा होता।

इसलिए कहलाता है युगांतकारी बजट
1991 का बजट डर के माहौल में उम्मीद लेकर आया।
ये सिर्फ आर्थिक सुधार नहीं था,
ये भारत के आत्मविश्वास की वापसी थी।
इसी वजह से जब भी बजट का इतिहास लिखा जाता है,
1991 का नाम सबसे ऊपर लिखा जाता है .
