बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान मामला उस वक्त और दिलचस्प हो गया, जब बहस के बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का जिक्र किया गया। सवाल यही है—बिहार की वोटर लिस्ट का इन विदेशी नेताओं से क्या लेना-देना?

चुनाव आयोग की दलील: विदेशी उदाहरणों से भारत को मत आंकिए
सुनवाई में चुनाव आयोग ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर विदेशी न्यायिक प्रक्रियाओं के उदाहरण दे रहे हैं। आयोग का तर्क था कि अमेरिका जैसे देश में भी चुनाव नतीजों को लेकर विवाद हुए हैं, जहां डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। इसी तरह वेनेजुएला में निकोलस मादुरो के चुनावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद रहे हैं। ऐसे में सिर्फ विदेशी मिसालों के आधार पर भारत की संवैधानिक व्यवस्था को गलत ठहराना सही नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप: पारदर्शिता पर खतरा
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिहार में चल रहा SIR मतदाता अधिकारों के लिए खतरा बन सकता है। उनका दावा है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और लाखों मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा सकते हैं। उनका तर्क है कि लोकतंत्र की जड़ मतदाता सूची होती है, और उसमें किसी भी तरह की चूक चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के सवाल: आम वोटर कैसे बचेगा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग से तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने जानना चाहा कि SIR के दौरान यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम गलती से न हटे। साथ ही यह भी पूछा गया कि आम नागरिक को अपनी शिकायत रखने और सुधार कराने का कितना मौका मिलेगा।
आगे क्या?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। मामले की अगली सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि SIR की प्रक्रिया में क्या बदलाव किए जाएंगे या नहीं,लेकिन इतना तय है कि बिहार की वोटर लिस्ट का यह मुद्दा अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों की बड़ी बहस बन चुका है—और इसी बहस में ट्रंप और मादुरो जैसे नाम भी चर्चा का हिस्सा बन गए हैं।
