
मध्य-पूर्व का अहम देश ईरान एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह—सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर बढ़ती सख्ती और प्रदर्शनकारियों को फांसी तक की चेतावनी। हालात ऐसे बन गए हैं कि सड़कों पर आवाज़ उठाना अब जान जोखिम में डालने जैसा माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
ईरान में बीते कुछ समय से महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक बदहाली को लेकर जनता में गुस्सा पनप रहा था। यही गुस्सा विरोध प्रदर्शनों में बदल गया। शुरुआत शांतिपूर्ण थी, लेकिन सरकार ने इसे देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए सख्त कार्रवाई शुरू कर दी।
सरकार का सख्त संदेश
ईरानी प्रशासन ने साफ कहा है कि हिंसक प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर “राज्य विरोधी गतिविधियों” के तहत कड़ी कार्रवाई होगी। कुछ मामलों में कानून के तहत मौत की सज़ा तक का प्रावधान बताया गया है। सरकार का तर्क है कि ये कदम देश में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी हैं।

डर और अनिश्चितता का माहौल
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि कई प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हैं। इंटरनेट पर पाबंदियों के चलते सही जानकारी बाहर नहीं आ पा रही। कई परिवार अपने परिजनों की तलाश में भटक रहे हैं—किसी को नहीं पता, अगला कदम क्या होगा।
प्रदर्शनकारियों की आवाज़
प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वे सिर्फ़ बेहतर जीवन, रोज़गार और सम्मान की मांग कर रहे हैं। उनका सवाल सीधा है—अगर सवाल पूछना अपराध है, तो आम आदमी अपनी बात रखे कहां?
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
दुनिया भर में ईरान की इस कार्रवाई पर चिंता जताई जा रही है। मानवाधिकार संगठनों और कई देशों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव का ईरान पर कितना असर होगा, यह अभी साफ नहीं है।
