सिंधु जल समझौते पर अंतरराष्ट्रीय अदालत का बड़ा फैसला, फिर भी भारत क्यों नहीं मानता इसे? समझिए पूरा विवाद

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सिंधु जल समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। नीदरलैंड के हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) ने 31 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा कि भारत द्वारा समझौते को ‘स्थगित’ रखने के बावजूद यह संधि अभी भी लागू है।

अदालत ने माना कि संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत भारत या पाकिस्तान अकेले इसे निलंबित या खत्म कर सके। साथ ही, रतले जलविद्युत परियोजना के कुछ निर्माण कार्यों को लेकर भी अंतरिम निर्देश दिए गए हैं।

लेकिन यहां सबसे अहम सवाल यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है, तो भारत इसे मान क्यों नहीं रहा?

इसका जवाब भारत के उस पुराने रुख में छिपा है, जिसके मुताबिक इस मामले में गठित यह मध्यस्थता प्रक्रिया ही वैध नहीं है।

पहले समझिए क्या है सिंधु जल समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता 1960 में हुआ था। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को दोनों देशों के बीच बांटा गया।

समझौते के तहत पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत के लिए, जबकि पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गईं।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पश्चिमी नदियों के पानी का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर सकता। समझौता भारत को कुछ सीमित परिस्थितियों में इन नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति देता है।

यही तकनीकी प्रावधान लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद का कारण बने हुए हैं।

31 अगस्त के फैसले में अदालत ने क्या कहा?

Permanent Court of Arbitration के सामने पाकिस्तान ने यह सवाल उठाया था कि भारत द्वारा अप्रैल 2025 में सिंधु जल समझौते को ‘स्थगित’ करने का फैसला कानूनी रूप से वैध है या नहीं।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने कहा था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और स्थायी रूप से खत्म नहीं करता, तब तक सिंधु जल समझौता स्थगित रहेगा।

अदालत ने भारत के इस रुख को स्वीकार नहीं किया।

उसका कहना है कि समझौते में किसी एक देश को अपनी तरफ से संधि को रोकने, निलंबित करने या खत्म करने का अधिकार नहीं दिया गया है। संधि तभी बदली या खत्म हो सकती है, जब दोनों देश इसके लिए सहमत हों और नई व्यवस्था पर पहुंचें।

अदालत ने भारत की ओर से उठाए गए कई तर्कों को भी स्वीकार नहीं किया। इनमें बदलती परिस्थितियां, आतंकवाद, संधि के कथित उल्लंघन, तकनीकी और जनसांख्यिकीय बदलाव, जलवायु परिवर्तन तथा सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

यानी अदालत के नजरिए से सिंधु जल समझौता अभी भी प्रभावी है।

रतले परियोजना पर भी आया आदेश

इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा जम्मू-कश्मीर की चिनाब नदी पर बन रही रतले जलविद्युत परियोजना है।

पाकिस्तान ने इस परियोजना के डिजाइन से जुड़े कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई थी। उसका कहना है कि परियोजना में ऐसे प्रावधान हैं, जो सिंधु जल समझौते की शर्तों के अनुरूप नहीं हैं।

इसी मामले में अदालत ने भारत को कुछ निर्माण गतिविधियों पर अंतरिम सीमाएं लगाने का निर्देश दिया है। इसमें बांध की दीवार और पावर इंटेक स्ट्रक्चर से जुड़े कुछ कंक्रीट कार्य शामिल हैं।

अदालत ने निर्माण की समयसीमा में होने वाले बदलाव की जानकारी देने को भी कहा है।

हालांकि, इस आदेश को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत इस पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया को ही स्वीकार नहीं करता।

भारत आखिर इस अदालत को क्यों नहीं मानता?

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत का कहना है कि सिंधु जल समझौते में विवाद सुलझाने के लिए पहले से एक निर्धारित व्यवस्था मौजूद है। इसके तहत कुछ तकनीकी विवादों को ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ (Neutral Expert) के पास ले जाने की व्यवस्था है।

भारत का आरोप है कि पाकिस्तान ने एक ही तरह के विवादों को सुलझाने के लिए समानांतर रास्ते अपनाए—एक तरफ तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया और दूसरी तरफ Permanent Court of Arbitration।

भारत के मुताबिक सिंधु जल समझौता ऐसी समानांतर कार्यवाही की अनुमति नहीं देता।

इसी वजह से भारत ने 2023 में ही इस मध्यस्थता अदालत की कार्यवाही में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था।

भारत का सीधा तर्क है कि जिस प्रक्रिया को उसने स्वीकार ही नहीं किया, उसके फैसले को मानने का सवाल भी नहीं उठता।

भारत के लिए यह सिर्फ पानी का सवाल नहीं है

भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का फैसला केवल किसी तकनीकी या जल विवाद के संदर्भ में नहीं लिया।

यह फैसला अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद लिया गया था।

भारत ने पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा था कि आतंकवाद और सामान्य संबंध एक साथ नहीं चल सकते।

सरकार ने इसी संदर्भ में कड़ा संदेश देते हुए कहा था कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।”

भारत का तर्क है कि जब दोनों देशों के बीच सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर गंभीर विवाद बना हुआ है, तब दशकों पुराने समझौते को उसी तरह चलाना व्यावहारिक नहीं है।

पाकिस्तान के लिए सिंधु का पानी इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर है।

पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए सिंचाई, खेती, पीने के पानी और बिजली उत्पादन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

यही वजह है कि भारत के सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के फैसले को पाकिस्तान केवल एक राजनयिक विवाद के रूप में नहीं देखता। वहां इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाता रहा है और भारत पर समझौते की शर्तों का पालन करने का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

लेकिन भारत का कहना है कि समझौता पुराना हो चुका है

भारत लंबे समय से यह बात उठाता रहा है कि 1960 में जब यह समझौता हुआ था, तब दोनों देशों के हालात आज से बिल्कुल अलग थे।

आज आबादी बढ़ चुकी है, पानी की जरूरत बढ़ी है, तकनीक बदली है और जलवायु परिवर्तन ने नदियों के प्रवाह तथा पानी की उपलब्धता को भी प्रभावित किया है।

भारत का कहना है कि इन बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए समझौते की समीक्षा और उसमें बदलाव की जरूरत है।

भारत ने पाकिस्तान के साथ इस मुद्दे पर बातचीत की मांग भी की थी, लेकिन दोनों देशों के बीच लगातार बने तनाव के कारण कोई व्यापक सहमति नहीं बन सकी।

तो क्या अब भारत पर अदालत का फैसला लागू होगा?

भारत के मौजूदा रुख को देखते हुए ऐसा कहना मुश्किल है।

भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह Permanent Court of Arbitration की इस कार्यवाही को मान्यता नहीं देता। इसलिए अदालत द्वारा दिए गए फैसले को भी भारत अपने ऊपर बाध्यकारी नहीं मानता।

दूसरी तरफ पाकिस्तान इस फैसले को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण कानूनी समर्थन के तौर पर देखेगा।

इससे आने वाले समय में सिंधु जल समझौते को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक और कानूनी टकराव और बढ़ने की संभावना है।

असल विवाद अब सिर्फ यह नहीं है कि सिंधु का पानी किसे कितना मिलेगा। बड़ा सवाल यह भी है कि क्या 1960 का समझौता आज की परिस्थितियों में उसी रूप में लागू रह सकता है और अगर विवाद हो तो उसे तय करने का अधिकार किस संस्था के पास है?

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